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अनुप्रिय पथिक

पनघट के एक पतवार में बैठी हूं ,
नदी के उस घाट में बैठी हूं l
मिले मेरा पथिक मुझे ,
मैं उसके इंतजार में बैठी हूं ,
अनुप्रिय है मुझे ,मैं उसके प्यार में बैठी हूं l
न इस पार बैठी हूं ,न उस पार बैठी हूं,
मैं बीच मझधार में बैठी हूं,
अनुप्रिय है, पथिक मेरा मुझे,
मैं उसके इंतजार में बैठी हूं l
समय गुजर रहा है, विरहा की अग्नि में,
उसकी एक आवाज में बैठी हूं,
मिलें मेरा पथिक मुझे मैं इंतजार में बैठी हूं l
©sgupta