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अपने मुस्तकिल का सिकंदर है वो ।

अपने मुस्तकिल का सिकंदर है वो
खुद में ही जिता जागता मंजर है वो।
अल्लाह तौफीक दे या न दे कोई फर्क नहीं
हर जफाओं के सामने खंजर है वो।
हिसाबन उसमें कोई खामियां नज़र तो नहीं
दिल में छुपाए ग़मों का समन्दर है वो।
हमने तह-ए-जमीं पर लाने की बेइंतहा कोशिश की
मगर ला न सका इतना अन्दर है वो।
खुद मे मसरूफ गुजारता महरुमी की जिंदगी
दूनिया के लिए बन गया फकत आडंबर है वो।
©anuragrahi