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अश्क

अश्क

दर्द इस दिल का उस बेखबर को बताने से क्या फायदा,

ज़ख्मों से अपने, उसे रूबरू कराने से क्या फायदा!

अश्क मेरे हैं, इन्हें समेट लेता हूँ अपने दामन में,

इन मोतियों को उस बेदर्द पर लुटाने से क्या फायदा!

तन्हाई में जो सुकूँ है, बस वही रहने दो मयस्सर,

उल्फ़त को भी बार-बार आज़माने से क्या फ़ायदा!

जिसे समझना होता है, वो आंखों में सब पढ़ लेता है,

हाल-ए-दिल का तमाशा बनाने से क्या फायदा!

खुद से मिल गया होता तो सारा जहां मिल गया होता,

मगर इस खता को भी दोहराने से क्या फायदा!

जिससे मोहब्बत हुई, उसने मुस्कुराकर के दगा दी,

पर इस झूठी महफ़िल में ये दर्द सुनाने से क्या फ़ायदा!

© विशाल सैनी

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