असमंजसता
कभी वैरागी ,
कभी रागी ,
ह्रदय ने ये कैसी डगर है साधी
इच्छाओं का बवंडर है यहाँ बाधी
जब चलती है जगत प्रेम की आंधी
तो वैरागी मन होता है रागी,
और जब हृदय की कश्तियां ,
मिथ्य जग की निद्रा से जागी
फिर वही कश्तियां वैराग की ओर है भागी
हे ईश्वर !
मुक्त कीजिए हमें इन असमंजस्ताओं की कड़ियो से ,
क्योंकि हमने अपने नियंत्रण की डोर है त्यागी ।।
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असमंजसता