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अतीत

राहतें थी, चाहते थी, खुदा था और खुदाया भी
ज़िद थी, जिंदगी भी वो सफ़र था बेखबर भी।
हम खुश थे, खुशनुमा भी, राहत थी रहनुमा भी।
ज़रा सी आँख खुली, बात रुकी, और टूटा सपना भी।
जिंदगी रुकी, मंजिले जुदा हुई, और रास्ते भी,
वो घड़ी नहीं रूकी, कुछ पल थमे और हम भी।
वो शाम भी ढली, वो बारिश भी हुई, और रात भी।
कुछ पल यादें भी रुकी, और बह गया वक़्त और आँसू भी।
©Jyoti Thak