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बागवानों क्या ढुढते हो वहां जाफरान न मिलेगा ।

बागवानों क्या ढुढते हो वहां जाफरान न मिलेगा
यहाँ सब पत्थरों के पेड़ है खड़ा शजर चंदन न मिलेगा।
चले आए हो तुम भटक कर यहां ऊचें इमारतों के देश में
तुमको तुम्हारे घर जैसा यहां कहीं गुलशन न मिलेगा।
अमिरों का शहर है ये अपने पैर व चादर को माप लो
तुमको तुम्हारे मुल्क का यहां मिट्टी का बर्तन न मिलेगा।
अपने नजर से देख कर आज बता रहा हूं मैं
पैसा तो चंद बना लोगे वो रिश्ता वोभाई बहन न मिलेगा ।
जो तन मन को भिगो दे रंग जीवन में नया भर दे
मधुवन में नाचती मोरनी के संग यहां सावन न मिलेगा।
चले जाओ अब तुम लौटकर अपने सरजमीं को अनुराग
ढुढने से भी इस जहां में हिन्दोस्तां सा वतन न मिलेगा।

©anuragrahi