बाज भी आ जाओ हिचकियाँ बढाने से
कब का निकाल चुका हूं दिल के आशियाने से।
मरहला-ए-दिल अब है विरान हो चुका
जख़्म-ए-उल्फत क्या बताऊँ जमाने से।
वो हमेशा के लिए हो गए हैं आंखों से ओझल
अब याद भी नहीं आते याद आने से।
न जाने कब आ जाए बाहर सोज़-ए-निहां मेरी
छिपा कर रखा है अभी तक मेहरबानों से।
क्या महफिल यूं हमेशा के लिए भरी रहेंगी
पुछना जरूर चाहिए उन सायबानो से।
जिगर के लहूं से सिंचा था अपने शज़र-ए-प्यार को
क्या मिला होगा उन्हें यूं काट कर गिराने से।
सुबह की रंजीश शाम तक मेरी जां ले लेगी
एक जाम़ पिला दो अपनी निगाहों के मयखाने से।
©anuragrahi
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