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Bachpan ke din

बस छूते ही शर्माती , इशारो पर मेरी उंगलियों की
थी वो एक कागज की कश्ती , जो थी बहती रहती
गुजरे बचपन के मेरे उन धारो मे ,
न वो थी मुझसे कुछ कहती , थी वो कभी डूबती कभी सम्भलती ..कभी अटखेलियां करती , कभी टकराकर किनारो से कुछ कहती ...
गुजरे बचपन के मेरे उन बरसाती नदी नालो में.
थी वो पहले रहती , किताबी पन्नो में मेरे ही ..
सोच थी वो मेरी ही , आखिर थी बनी वो मेरे ही हाथों की
दिखती थी वो कुछ ऐसी , बस स्वेत --,स्वच्छ थी , वो मेरे ह्रदय सी .
पर अब गुमनाम है , वो भी , बस मेरे गुजरे बचपन सी अनजान. है , अब वो जान - पहचान कर वो मुझसे , अब ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती , बस सपनो और यादों में ही दिखती , झलकती , खो गयी है , जाने वो कैसे , वक्त के करवट बदलते ..वक्त की अंधियारी उन गलियारों में..सागर की गहराइयो मे . पर्वतो की उचाईयों मे..
©rajendra