बच्चों की तरह चलों मिट्टी के घर बनाते हैं
झूठ-मूठ का ही सही एक रिश्ता निभाते हैं
मेरी मज़बूरी है कि मैं उन्हें याद करता हूं
उनकी क्या मजबूरी है जो वो इतना याद आते हैं।बच्चों की तरह चलों मिट्टी के घर बनाते हैं
झूठ-मूठ का ही सही एक रिश्ता निभाते हैं
मेरी मज़बूरी है कि मैं उन्हें याद करता हूं
उनकी क्या मजबूरी है जो वो इतना याद आते हैं।