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बच्चों की तरह चलों मिट्टी के घर बनाते हैं झूठ-मूठ का ही सही एक रिश्ता निभाते…

बच्चों की तरह चलों मिट्टी के घर बनाते हैं

झूठ-मूठ का ही सही एक रिश्ता निभाते हैं

मेरी मज़बूरी है कि मैं उन्हें याद करता हूं

उनकी क्या मजबूरी है जो वो इतना याद आते हैं।