S

बचपन में बेटियां।

वो सहेलियाँ बचपन की
याद बहुत अब आती है।
मेरी तसल्ली के लिए ये दिल
खुद गम में डुब जातीहै।
जब आपस में बिच सखियों से
हम दुल्हा दुल्हन बनते थे।
पपिते की डंठल की पुपहिया
टिन कनस्तर के नगाड़े बजते थे।
केले के पत्ते की थाली संग
प्रितीभोज की पंक्ति बन जाती थी।
वही रेत के चावल, दाल पानी के
थाली की शोभा खुब बढाती थी।
अब तो दिन लद गए हमारे
जबसे हमने व्याह किया।
सखियों की क्या खबर रखें
बाबुल का घर जब त्याग दिया।
बचपन में कभी न थी ये नग्में
खलल डाल दी अमिर गरिब के तग्में।
अब तो बस हम सब में रूसवाई है
पैसे से न बड़ा कोई हरजाई हैं।
©anuragrahi