बड़बड़ करती आँखें उसकी
वल्लाह वो ख़ामोश मिजाज़।
हौले-हौले आँखों से उसकी,
खुलते खट्टे-मीठे राज़।
बड़बड़ करती आँखें उसकी
वल्लाह वो ख़ामोश मिजाज़।
फर्श से अर्श तक जा पहुँची हूँ
करते-करते मै परवाज़।
सामने आए तो धड़कन धड़ से,
करती यूँ ऐसी आवाज़।
बड़बड़ करती आँखें उसकी
वल्लाह वो खामोश मिजाज़।
आँखों की बातें कौन न जाने
अपना-अपना है अन्दाज़।
इज़हार ए बयानी के क्या कहने,
करती जो एैसे आग़ाज़।
बड़बड़ करती आँखें उसकी
वल्लाह वो ख़ामोश मिजाज़।
मौसिकी में डूबी आँखें उसकी
छेड़ती एैसे-ऐेसे साज़।
बच सकता शायद ही कोई,
इस धन्धे का माहिर जाँबाज़।
बड़बड़ करती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
वल्लाह वो,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ज़ुबाँ से बेहतर आँखें उसकी
बिन बोले कहती अल्फाज़।
बेचैनी है अक्सर मन को,
खामोशी की करती अरदास।
बड़बड़ करती,,,,,,,,,,,,,,,
वल्लाह वो ख़ामोश मिजाज़।
©mannjaisy
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