बड़े अकीदत से पेश आए आप ये बहाना नया है
मिलती रहे गर ऐसी तबज्जू दिल रोजाना नया है।
हम फ़िक्र-ए-ख्वाब करते रहे आप सामने आ गए
लगता है दरम्यां मेरे आपके कोई मसला नया है।
हमने कह दिया था अब हम नहीं आपके काबिल
ठहरे हम पुराने मिजाज के और ये ज़माना नया है।
इक रंग में रहता नहीं क्यों ये रंग-ए-जमाना
जब देखिए तब जलवा-ए-जनानां नया है।
साकी पिला दो जाम भर भर कर आज़ खुब मुझे
ग़म-ए-हुस्न के मारो में ये भी दिवाना नया है।
रहने दो जुल्फों के साए में हो सकें संभल जाए अनुराग
कच्ची है उम्र अभी और मिजाज आशिकाना नया है।
©anuragrahi
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