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बड़ी उम्र की स्त्रियों का प्रेम

हाँ,बड़ी उम्र की स्त्रियों को,
भी हो जाता है अकसर प्रेम।
जो होता है एकदम परिपक्व।
जानते हुए कि छली,
जाएंगी,ठगी जाएंगी,
सहर्ष मोल लेती है।
सच तो ये है जीना चाहती है,
अपनी बिसराई,भूली जिंदगी,
जो दफना आई ,दायित्व की,
चट्टान के नीचे, गहरे कहीं।
सिर्फ देना ही नहीं वो,
पाना भी चाहती है वो स्नेह।
उनकी उम्र से बड़ी होती है,
उनकी परछाईं की उम्र,
जो मुड़ झिड़कती है,
"हद में रहो, हो जाएगा
चरित्र दागदार।"
नहीं व्यक्त करतीं है वो अपनें,
अंदर उमड़ती भावनाएं।
छेड़ना चाहती हैं,
चिढ़ाना चाहती हैं
खिलखिलाना और शरमाना
चाहती हैं खुल के।
नहीं लुभाता उन्हें,
दैहिक आकर्षण ,
नहीं बनना चाहती,
वो बिछौना किसी का।
होती है बस चाह,मन से
मन के मिल जाने की।
खोजती है वो ऐसा कोई,
जो दे तवज्जो उन्हें,
मुखर हो,बिखर जाए,
जिसके समक्ष बिना किसी,
लाज शर्म लिहाज पर्दे के।
बांटना चाहती हैं
बचपन, जवानी और
चल रही कहानी ।
रोक लेती है उन्हें,
रिश्तों की मर्यादा,
पकड़ हाथ खींच ले जातीं है
वापस,लक्ष्मण रेखा,
ओहदों की।
खींच लेतीं है खुद के इर्द गिर्द ,
लक्ष्मण रेखा खुद ही।
छुपा लेती है खुद को,
कहानी,किस्सों,
लेखों,संस्मरणों के
भीतर ही कहीं।
हाँ, बड़ी उम्र की स्त्रियों
को भी हो जाता है
अक्सर प्रेम।
©padmadhar