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बदगुमानी।

न जाने सारे अपजस मेरे ही नाम क्यों है,
शहर में है और लोग मगर बदनाम हम क्यों है।
संजिदगी है गर मुझे तो है मेरी किस्मत से,
बेवजह नुक्से निकालने में लोग परेशां क्यों है।
क्या वो खाक रहबर होंगे जिन्हें चलना नहीं आता,
देखते तो हैं हर चिज मगर जिन्हें समझना नहीं आता।
सोंचते ही नहीं शायद आज बसर है वो किस्मत से,
काफी है हम आदमी को यहीं जहां फिर दो जहां क्यों है।
आदमी तेरा एक ही गुनाह-ए-झुठ दोजख को काफी है,
कराके हजार गुनाह खुदा मेरे देर करता क्यों है।
पता है दूर तक मैं किसी जन्नत के काबिल ही नहीं,
फिर नाम-ए-अनुराग की जन्नत की अफवाह फैलाता क्यों है।
©anuragrahi