जब अपनों के तनाव को ध्यान से सुनते हैं
तो उनके शब्दों से कुछ बेचैन हो जाते हैं
जिनकी मुस्कुराहटों के लिए प्रयास किया करते थे
उन्हें तकलीफ में देख खामोश हो जाते हैं
लगता है उनके भीतर आघात गंभीर हो जाते हैं
जिन्हें देखकर ना चाहते हुए हम भी कमजोर हो जाते हैं
दृढ़ता की चादर में हम इस कदर लिपटे हैं कि अश्रु बाहर ना निकलकर भीतर में ही खो जाते हैं
जीवन की गहराइयों को समझते तो जाते हैं
पर अपनों के इस हाल से हम घायल होते जाते हैं
और शब्दों के दरमियान में उन्मुख हो जाते हैं
ईश्वर की कृपा इस रूप में पाते हैं
की लिखते लिखते ही हम कुछ खाली हो जाते हैं !!
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