एक दिल दो जान,
अब जुदा हुए तो हो गए बेजान,
अक्सर यही हुआ करता है।।
एक की गलती का भुगतान,
दोनों को ही करना पड़ता है।।
वजह कैसी भी हो,
गलती तो गलती ही होती है।।
मकसद चाहे कोई हो या ना हो,
बेवजह की हुई चीज भी कभी - कभी
बहुत ज्यादा खलती है।।
फर्क तो बहुत पड़ता है..
फर्क तो बहुत पड़ता है..
मगर कभी आंसू तो कभी उसका जख्म,
सब बताने से रोक लेता है।।
तकदीर में तकलीफ़ कुछ
इस कदर लिखवा लाए है,
अपने ही हाथो से अपने घरोंदे को,
निस्तानुबूत किया करते हैं।।
हम जाने क्यों हर बार ही
उसे खफा किए रखते है।।
अब बताए भी तो क्या..
अब बताए भी तो क्या..
कि किस खुशी में,
ये बेवकूफी किया करते हैं।।
उसे पाने की चाहत में,
उसी से दगा किया करते हैं।।
©anvisha
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