लहरें जो निकल पड़ी,उसके नैनों से झुमती,इठलाकर दहक उठी,मेरे नैनों को चुमती,तस्वीर उसकी ख्वाबों में मेरे,एक अक्स बना गई,शरारती पलकें तनहा रातों में,उससे रुबरु होती रही,लेटे थे वो सेज पर बड़े इत्मिनान से,उस सेज से हमने गुमान में घंटों गुफ्तगू भी कि,हां अलग खुमार में जालिम दिल यु महक उठा,इक रुहानी सुगंध से मेरा कमरा महकने लगा,खुली बिखरी लटो ने,हम पर ऐसा असर किया,अदाओं का रहा कसुर,हमें कायल कर दिया,फिर भी ये कमाल है,उनका गजब मिजाज है,दिवाने हुए बेसब्र और वो नज़र अंदाज़ करते रहे,सोचता हूं लु इजाजत,मखमली गाल से,कि भर लूं मन मीठास से,तब्बसुम के जाम से,हर पल मन ये सोचता है,उसका साथ बना रहे,आइने को दी है रिश्वत,कि मेरा ख्याल सजता रहें,बितते वक्त के साथ ऐसा शराबी रंग चढ़ता रहा,हमने शराब छोड़ दि,फिर भी राते नशेमंद रही,उस महजबीं के नुर में हम,हर पल भीगते रहे,उन्हें पता तक न चला,जाने क्या वो सोचते रहे,इस कायनात में ये,जवानी कितनी हसीन है,हम धीरे धीरे चख रहे है,ये ज़हर बड़ा नमकीन है,इक हुस्न अपनी सादगी से जाने कैसे अंजान है,कई शायर लुट गऐ है और वो बेखबर बने रहे,
🥀कवी:-अभय ना. ताकसांडे 🥀
©abhayt
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