अनसुलझी कायनात में
असंख्य ख़्यालों की बरसात में
हर दिन की कोर से शुरू हुई रात में
नित्य होते परिस्तिथियों के आघात में
भीतर में जाती अशुद्धतम वात में
मिथ्या समझ तले अहंकार पूरित बात में
उम्र की ढलती प्रभात में
जीवन का अन्य पहलू छुट सा जाता है
हृदय ईश्वर के असीम आंचल को समझ नहीं पाता है
प्रकृति के रक्षाकवच से अनजान हो जाता है
विद्वान होने के अनुसंधान में
मासूमियत साधे हृदय से परे गुमनाम हो जाता है
ऊर्जा के असंख्य नैनो से झलकते प्रेम से दूर
ऊर्जा श्रीण कराती वस्तुओं के पीछे बेलगाम हो जाता है
और शांतमय ईश्वर की गोद में भी बेनाम हो जाता है।।
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