कंही तो होगी
हजार बार अधूरी रही चार पंक्तियों की तरह
किसी निर्मनुष टापू पर खिले फूल की तरह
कंही दूर रोज बजती मधुर धुन की तरह
किसी गांव में पनपती कहानी की तरह
कंही तो होगी
गहरे समंदर में बिखरे मोती की तरह
ऊंचे पहाड़ों में अकेली मजबूत घांस की तरह
किसी साधू की बरसों चली साधना की तरह
कंही होगी इंतजार करती किनारों का कश्ती की तरह
कंही तो होगी
किसी शायर के अनोखे लफ्ज़ की तरह
किसी चित्र के अनोखे रंग के तरह
किसी दरिया के अकेले किनारे की तरह
कंही पास भी होगी किसी अपने की गुफ़्तगू की तरह
कंही तो होगी
मेरे ख्वाबों जैसे हूबहू ख्वाब रखने वाली
मेरी उम्मीदों को हकीकत में बदलने वाली
मेरे ख़यालों से इत्तफाक रखने वाली
न बोली मेरी बोली को बेहद खुबसूरती से समझने वाली...
- आशय
©ashay
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