बहुत पहिले जब बेटी का "कन्यादान " किया जाता था..कहा जाता था बेटी आज से यह घर तेरा पीहर तो है पर तेरा असली घर तेरी ससुराल ही हैं..कोई कोई यहाँ तक रौ में बह कर कह डालता था कि ...डोली बेटी की केवल जाती है ..और वापस केवल अर्थी ही आती है ..यानी जीते जी लड़ झगड़ कर वापस मत आना...
पर अब परिस्थियाँ बहुत बदल गयी हैं और ससुराल जाती लड़की से माँ कुछ और ही कहती है जो न केवल सही है ..उचित और तर्कसंगत भी है..और शायद यही सभी माँ बाप और मैके या पीहर के लोगों को भी कहना ही चाहिये.. जिससे अपनी लड़की की हिम्मत बनी रहे..और वोह ससुराल में मान सम्मान से रह सके..
विदा होती बेटी को माँ की सीख
" कन्यादान " ..जाओ .. मैं नहीं मानती इसे .....
क्योंकि मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं ...जिसको मैं दान में दे दूँ...
( प्रस्तुत पंक्ति हमारे किताब - बेटी हूँ मैं से है)
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मैं तो बांधती हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में ..
पति के साथ मिलकर निभाना तुम ..
मैं तुम्हें अलविदा नहीं कह रही .....
बेटी आज से दो दो घर हुए
जब जी चाहे पीहर आना तुम ...
जहाँ जा रही हो (ससुराल)...
वहाँ खूब प्यार बरसाना तुम ...
सब को अपना वहाँ बनाना तुम ....
पर कभी भी ..न मर मर के जीना ..
न .ही ...जी .. जी.... के ही.....मरना तुम ...
तुम ही अन्नपूर्णा .. शक्ति भी रति भी तुम ...
ज़िंदगी को अपनी भरपूर जीना तुम .....
न तो बेचारी हो और न ही अबला तुम..
खुद को कभी असहाय न समझना तुम ...
मैं दान नहीं कर रही हूँ तुम्हें ....
केवल बाँध रही हूँ एक और मोहब्बत में तुम्हे..
उसे बहुत खूबसूरती से बखूबी निभाना तुम .....
दोनों घरों की मर्यादा भरपूर निभाना तुम..
विश्वास ..प्यार और आदर की सरिता बहाना तुम
तब ही मेरी सच्ची बेटी कहलाओगी तुम
दोनों घरों में प्यार और दुलार पाओगी तुम
यह है एक माँ की नयी सोंच और सीख
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©wrter-abhi
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