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बेटी तुम हो मेरी छाया तुम्ही मेरी मुस्कान हो।

बेटी तुम हो मेरी छाया तुम्ही मेरी मुस्कान हो
गर्व से मैं चल सकूं तू ही मेरी अभिमान हो।
देवलोक की देवी रूप तुम गुण विलक्षण तेरे
मेरे पगड़ी की हो शोभा तूम मेरी पहचान हो।
झर-झर,झर-झर नयन बरसे पर ये अंतर मन हर्षे
मेरे अडिग कल्पना का तूम अनमोल वरदान हो।
तेरी सेवा तेरी शिक्षा मैं दू उतम तुम्हें भी परस्पर
घर घर हर मां बाप के जेहन में बस यही विधान हो।
शिक्षा सेवा स्वास्थ्य तकनीक में है अव्वल बेटी
खुद में पंख लगाकर अब ओर आसमां के उड़ान हो।
नया युग का नया सवेरा नए जोश से उत्थान हो
स्वपसंद की साथी चुनने का उनका भी सम्मान हो।
मेरी यह कविता मेरे पोईमिया संग्रह के मित्र नवोदयान की एक कविता से प्रेरित होकर लिखी गई है जो कि मैं उन्हें समर्पित करता हूं।
©anuragrahi