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* भारत * ; भूखा , रोता , तड़पता (भारत)

वक़्त ग़ुलामी से बद्तर है आज की दौर ए आज़ादी
जिसमें भूखी और ऩगी है मेरे भारत की आबादी।


जिस ओर नज़र दौड़ाओगे बस झूठ ही झूठ को पाओगे
सच का नामो निशां नहीं कैसे भला बच पाओगे।


हर इक इन्सां आज यहाँ दौलत का ही मतवाला है
रूपयों पैसों वाले अमीरों का ही बस बोलबाला है।


इंसाफ के हर तराज़ू पर झूठ को तौला जाता है
फिर भी देश के पहरेदारों से लब न खोला जाता है।


हैवानियत क्या परवान चढी है।भारत माँ आओ देखो तो,
अस्मत नारी की लहू लुहान पड़ी है। भारत माँ आओ रोको तो।


सच्चाई का पहन मुखौटा , रावण सा वार करते हैं
अपने घिनौने कुकर्मों से फूलों को ख़ार करते हैं।


न जाने कितने मासूमों की होली,ख़ून से खेली जाती है
मुझसे ये सारी बातें बिल्कुल न झेली जाती हैं।


नफ़रत की इस ज्वाला में कितनों के घर जल जाते हैं
देश किया है सुपुर्द जिनके वही हमें लड़वाते हैं।


कुचलों को कुचला जाता है , रौंदे को रौंदा जाता है
ऐसे ही तो बाबू जी काला धन जुट जाता है।


गर बात करूँ मैं नौकरी की, तो रिश्वत की बात ही आती है
अक्सर क़ाबलियत क़ाबिल की एक ताक पर रख दी जाती है।


और इतना ही नहीं सुनिए तो चिकित्सालय का हाल ज़रा
कितने लोगों की जान गई , बेपरवाही से इस साल ज़रा।


छोड़ो वो सब तो जाने दो बारी अब आवास की आती है
बँटता है घर घरवालों में बेघर की आस छिन जाती है


पुलिस चौकी से न्यायालय बस भ्रष्टाचार का पहरा है
मेरे भारत का संविधान क्या अब भी गूँगा बहरा है।


कीचड़ सी गन्दी राजनीति में कीड़ा तक पड़ जाता है।
देखते देखते हर दागी दिग्गज नेता बन जाता है।


साम दाम और दण्ड भेद से अपनी बात मनवाता है।
मेरे भारत का हर ग़रीब बस् रोता है चिल्लाता है।


By ,Mann Jaisy©mannjaisy