आज अपनी इन भावनाओं में डूब जाना चाहती हूँ
हाँ मुझे तैरना नहीं आता
फिर भी मैं इन विचारों को गहराई तक जाना चाहती हूँ
ये जो सहसा मन मचल उठा है
पहली बार तो नहीं है
जानती हूँ मन क्या चाहता है
मगर इसकी चाहते अब पूरी नहीं कर सकती
मैं हर बार अपना आपा नहीं खो सकती!!
जाने कैसी कश्मकश है
दिल चाहता है जो वो मैं चाह कर भी नहीं कर सकती
नहीं - नहीं ये अहंकार या अहंम नहीं
ये परवाह है
परवाह है तेरी बातों की
परवाह है तेरे ज़ज़्बातों की
इसलिए खुद को रोक रही हूँ
हाँ मैं अपनी खुशियों का गला घोंट रही हूँ!!
समझा नहीं सकती
इसलिए खुद को बस इसी जरिए से बहला रही हूँ
अपने अरमानों को कहीं अँधेरे में दफना रही हूँ
बस यूँही मैं खुद को बहका रही हूँ!!
©shaaya
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