अश्रुअन् के बहाव को पीता हृदय ,
अपनी कोमलता पर दृढ़ता के वस्त्र सिता हृदय ,
ईश्वरीय प्रेम रस में ही हर क्षण जिता हृदय,
ईश्वर संभाल लेंगे उसे यही सोचकर,
इस भटकते संसार में जिता हृदय,
कभी साँझ संग बैठा करता
कभी सवेरे शीश झुकाता है वो
तिनके सा है वाहन(शरीर) उसका
अपनी वास्तविकता की तलाश में,
अंतर्तम तक भीगा है वो
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