बच्चों की आंखों को भीतर में महसूस करता हूँ...
उनके जैसा बनकर उनके समक्ष हर पल निखरता हूं...
ना जाने कैसे धीरे-धीरे उनका चहेता बनता हूं..
फिर मैं अपने भीतर के बच्चे से मिलता हूं और उसे बचपने के लिए प्रेरित करता हूं...
अपने भीतर हिम्मत भरता हूं और बच्चों संग उछल कूद करता हूं...
जाने अनजाने में खुशियों का रुख अपनी ओर करता हूं और अपने खुशहाल स्वरूप से करीब से मिलता हूं..
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