जीवन के उद्देश्य को खोकर
भौतिकता में लिपायमान होकर
खाता है मानव भ्रम की ठोकर
आंतरिकता के उजियारे में सोकर
बनता है इस मिथ्य जहां में जोकर
जब थक जाओ दुनिया के इन मुखौटो में ,
तब आ जाना अपने भीतर में रोकर
खामोशियों में थोड़ा वक्त बिता ,
मुस्कुराना अपने विचारों को धोकर
इस जहां को मन की सरलता दिखलाना
भीतर की रोशनी में प्रस्फुटित होकर
कुटिलता में फंसी इस दुनिया को ,
पहनाना माला शुद्ध मणिये पिरोकर
अहंकार के वस्त्रों को धोकर
सहलाना तू भीतर को ईश्वर में समाहित होकर
ईश्वर में समाहित होकर.........
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