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भले वस्ल की तू मुझसे मियादें बढ़ा दे।

भले वस्ल की तू मुझसे मियादें बढ़ा दे
वफाओं को मेरे न ऐसे सिला दे।
अभी इस मुहब्बत की सहर तो हुई है
रूला दे हंसा दे मगर न हमको भुला दे।
दस्तूर मुहब्बत के हम कभी ऐसे न देखें
हमीं काम आएं और हमीं को सज़ा दें।
इस हुस्न के जादू से बेखुद तुम्हीं ने किया था
तुम्हें चाहिए था कि हमें आसरा दें।
हमें जाम-ए-जहर भी तब लगेगा अमॄत
शर्त अपने हाथों से बस हमें तू पिला दे।
इल्तज़ा है सुकुन-ए-रूह के खातिर कि तुमसे
आके मजार पे अनुराग के भी इक चादर ओढ़ा दे।
©anuragrahi