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भ्रष्ट व्यवस्था।

इफ्तिखार उन्हें जो इत्तिफाक से मिली है,
खुद को बाबु,साहिब-ए-मसनद समझ बैठे हैं ।
अब तो पां जमीं पर टिकते ही नहीं उनके,
लगता है चांद पे मकां बना बैठे हैं।
बीनाई ऐसी पल्टी उनकी जो लोग किड़े लगने लगे,
गुरूर में अपने,बेकसूरों को पांव तले मसलने लगे।
खुद को रहनुमा गरिब का मसिहा कहते हैं,
उन्हें पता नहीं शायद,ओहदे यमराज की ले बैठे हैं।
सभी मेंजें, हर टेबल दफ्तर की उन्हीं से चलती हैं,
क्यों न चले भला, हक कुबेर का जो जता बैठे हैं।
तू तो अनुराग अपनी खैर कर पारी अभी तक न आने का,
वगरना तो वो सुपारी तेरे नाम की बहुत पहले से ले बैठे हैं।
©anuragrahi