आज क्यों मेरा शब-ए-खल्वत है,
इस खल्वत में मुझे तेरी जरूरत है।
तू है रोशनी मेरे अंधेरे के लिए,
आ जा मुझे रोशनी की जरूरत है।
साल-हा-साल है मैने तूम पे जुल्म किया,
मैनें माना कि ये बहुत बड़ी अजियत है।
हम दोनों फिर अब साथ साथ रहे,
बस इसी में हम दोनों की ख़ैरियत है।
न होगा गिले सिक्वे न आनाबानी कभी,
सोंच लो फिर से ये मेरी लौटी मुहब्बत है।
तू करेला तो मैं काली मीर्च ही सही,
मिलाकर दोनों को पिने में ही मुरव्वत है।
जमाना क्या कहेगा गर हम अलग अलग रहे,
फकत हमारा नहीं पूरे ख़ानदान की फजीहत है।
आओ मिलके दिखा दे उनको जो हम से जलते है,
यही हम में इंसानी हमारी हैसियत है।
तुम जो कहती हो तुम्हें और किसी से रगबत-ए-दिल है,
मगर सुन लो ये तेरी अपनी तबियत है।
है तेरे पहलू में ही अब नसीम-ए-बहार,
मुझे इधर उधर ताक झाँक करने की क्या जरूरत है।
©anuragrahi
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