बहुत दिन गुज़रे इन होंठों से कुछ गुनगुनाए हुए
दिल में दस्तक दी जैसे हो कोई आए हुए।
आज़ चांद ने भी पसारे है फिर से वो चांदनी
जैसे इंतजार में हो महबूब बांहे फैलाए हुए।
फिजा के संग हवा में वो राग वो सुर रम गयी
लगता हो जैसे हमने इसे है पहले कभी गाएं हुए।
जिंदगी का भी अब हमसे है ये कैसा मज़ाक
क्या मिलने आएंगे वो जो हमसे अब पराएं हुए।
मगर मैं अपनी ग़ज़ल आज़ गाऊंगा जरूर
रख सकतीं हैं कितनी देर खुद को मुझसे छुपाएं हुए।
उसने अनुराग को ग़म देकर एहसान ज्यादा नहीं किया
दफ़न हो गई मेरे सैकड़ों गुस्ताखियां दबाएं हुए।
©anuragrahi
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