बहुत किया इंतजार अब तसल्ली न दो
तुने दिया हमें बहुत आजार अब तसल्ली न दो
वादा-ए-वस्ल हुआ न कभी हमें मयस्सर
कैसा ये प्यार कैसा इज़हार अब तसल्ली न दो
पता होता तिजारत-ए-दिल है बड़ा महंगा
फिर न करते हम ये व्यापार अब तसल्ली न दो
याद करने से ज्यादा तुझे है भुल जाना बेहतर
कौन है यहां गमख्वार अब तसल्ली न दो
आज़ अनुराग फिर है खुद से रूठा हुआ
दिल में जो पड़ गई है दरार अब तसल्ली न दो।
©anuragrahi
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