हाँ , नहीं सही जाती
मुझसे ये तन्हाई
नहीं पसंद मुझे अब
खुद की परछाई
इन दिवारों की रंग में
सौ सौ दफा डूब चुकी हूँ मै
बस इन महलो में बंद बंद
बहुत ऊब चुकी हूँ मै
😞😞😞😞
ना जाने कब
मै खुद से मिलूंगी
इस स्वर्ण-पिन्जर को छोड़
खुली हवाओ में उड़ूगी
कब इन छोटे गमलो से निकल
बड़ी बगिया में खिलुगी
बस यही अरमा में
डूब चुकी हूँ मै
इन महलो में बंद बंद
बहुत ऊब चुकी हूँ मै
😐😐😐😐
इन्तज़ार है मुझे,,
उस पल का
और सोचती हूँ
कब आएगी वो घडी़
जब करूंगी अपने मन की
और हो जाउंगी बड़ी
इन नयनो में अश्क़् ना सही
पर इसकी समुन्दर में डूब चुकी हूँ मै
इन महलो में बंद बंद
अब बहुत ऊब चुकी हूँ मै
😞😞😞😞😞😞
©richapriya
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