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भूल ए इस्क

तेरी हर खता को मैं इस्क समझता रहा.
मैं यही भूल करता रहा ।
तेरी पंक्तियाँ ,सिर्फ पंक्तियाँ थी जिन्हें मैं पढ़ता रहा,
मैं कुछ और ही समझता रहा ।
समंदर सी गहराईयाँ थी तेरी पंक्तियों मे ,
पहाड़ जैसी ऊचाँइयों पर चढ़ता रहा ।
सपनों में पंख लगा कर उड़ता रहा,
मैं यही भूल करता रहा,..
तेरी हर खता को मैं इस्क समझता रहा ।

©sandeepgup