बन गया है हकीकत अफसाना कोई
ग़म देने वालों में है मेरा अपना कोई।
चश्म-ए-नम न हुई मेरी कभी ये आंखें
अब निगाहों का बन गया है गहना कोई।
हद से ज्यादा दिल ने किया था भरोसा
दे गया हैं ज़ख्म गहरा-ओ-सदमा कोई।
बहुत सजाया था सोंचकर काशिदाने दिल ने
कि आएगा इस घर में रहने मेहमां कोई।
गुज़र गई आधी उम्र इकरार-ए-इश्क में
हमने तो नहीं देखा अनुराग तेरे जैसा इंसां कोई।
©anuragrahi
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