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बनीं हैं इमारतें जहाँ वहाँ इक मयखाना था।

बनी है इमारतें जहाँ वहाँ इक मयखाना था
माशुकों के दिए गमों का इक बड़ा खजाना था।
हम दिन और रात यहां वहां अब भटकने लगे हैं
अपना तो बस वही बचा इक ठिकाना था।
अब तो बेखौफ बेपर्दा हसिनें रहा करतीं हैं
हमारे शहर में तो पर्दानशी का इक जमाना था।
लोग करिब रहकर भी मिलते नहीं रूठे रूठे से है
हमारे वक्त तो खुबसुरत मिलने का होता बहाना था।
ऐतबार नहीं मुझपर जो थाम लिया हाथ रकिब का
जरा और ठहर जाती मुझे बहुत कुछ अभी बताना था।
तुझे मालूम नहीं किस कदर चाहा था अनुराग ने तुम्हें
आज सर छुपाने के लिए इक मर्हला नहीं जहाँ कभी आशियाना था।
©anuragrahi