बर्बाद होकर अब मैं राह-ए-सफ़र छोड़ना चाहता हूँ
कितना नासमझ हूं दिल का शहर छोड़ना चाहता हूँ।
ये सच है कि,नहीं है मुझे कोई तिजारती हूनर
हर तह-ए-दिल पर अपना असर छोड़ना चाहता हूँ ।
ग़म-ए-हिज्र ने खोखला कर दिया है जिस्म को
लफ्ज़-ए-ग़ज़ल में सदा-ए-दिल अमर छोड़ना चाहता हूँ ।
फलक से महबूब के लिए सब चांद-सितारों की बात करते हैं
जर्रे-जर्रे में अपना गंध-ए-पहर छोड़ना चाहता हूँ ।
रिश्तों को खोकर कौन सी मुकाम पाना चाहती है दुनिया
मैं इसरार-ए-मुहब्बत में मरहले-मगहर छोड़ना चाहता हूँ ।
©anuragrahi
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