V

बर्तन

अंतिम काल में वृद्ध एक मरने लगा,
मरते-मरते अपने पुत्र से बातें करने लगा,
मैंने अपने जीवन में बहुत धन कमाया,
गलत काम में कभी नहीं लगाया,
संचित धन से मैंने बहुत कुछ बनाया,
राज्य में सबसे ज्यादा नाम कमाया,
अब मेरा आ गया है अंतिम काल,
तुम सम्भालो ये स्वर्ण थाल,
वृद्ध की अंतिम सांस निगल गया काल,
नये सेठ जी ने सम्भाल लिया सारा माल,
सेठ जी तो निकले मक्खीचूस,
सेठ जी तो थे कंजूसो के महाकंजूस,
सेठ जी ने सोचा, जिस दिन होगा बड़ा उत्सव,
उस दिन निकालूंगा ये स्वर्ण बर्तन,
समय बीतता गया, इक दिन आया राज मंत्री,
सेठ जी ने सोचा, आज निकाले बर्तन,
लगा सोचने, कंजूस सेठ,
निकालूंगा बर्तन, जब आएगा राजा,
समय चक्र चलता रहा,
इक दिन आ ही गया महाराजा,
कंजूस सोचे, राजा के आने का क्या टशन,
निकालूंगा उस दिन जब होगा बड़ा जश्न,
सोचते सोचते सेठ जीकी उम्र बीत गयी आधी,
वो समय आ गया, जब बेटे की हो गई शादी,
अब बेटे की शादी में क्या दिखावा करना, पौत्र के जन्म पर निकालूंगा स्वर्ण,
काल गति चलती रही और वर्ष भर बाद पौत्र के घर में पड़ गये चरण,
क्यों निकालूं बर्तन, जब होगा पौत्र का विवाह,
तब कराऊंगा मैं अपनी वाह वाह,
काल चक्र तेजी से चलता गया,
इक दिन सेठ भी अंतिम सांस लेता गया,
पन्द्रह दिन बाद पुत्र ने सारा काम निपटाया,
घर की कोठड़ी में पड़े बर्तन को उठाया,
इतने सालों में स्वर्ण बर्तन हो गये गंदे,
देख गंदगी पुत्र को गुस्सा आया,
बोला नौकर से, कोठड़ी से बर्तन उठाओ,
घर ले जाओ और इसमें खाना खाओ,
मानव भी यदि नहीं करेगा ज्ञान, शक्ति का प्रयोग,
तो लग जाएगा इसमें रोग,
नई पीढ़ी उठाकर फेंक देगी भारतीय ज्ञान,
सम्भल जाओ, लो थोड़ा इसका संज्ञान।
विकास गर्ग
©vicky