वो रोज छुप छुपकर रोना,
हसते हुए सब कुछ सहना,
आंसू गिरकर भी छुपाना,
यए कहना की सब सही है ना,
अब इस से बुरा भी क्या होगा,
आज सच बताऊ,
रोज एक समय आता है जब मैं कहती हूँ
बस बहुत हुआ।
ए मुश्किल ,
अगर फितरत मेरी सहने की ना होती,
तो शायद हिम्मत तुम्हारी परेशान करने की ना होती,
और हाँ! माना परेशानी मे हूँ,
रोती हूँ,
पर हारी नही हूँ,
पर रोज एक समय आता है जब मैं कहती हूँ
बस बहुत हुआ।
मम्मा-पापा से कहती हूँ सब ठीक है,
बाहर से ठीक हूँ,
अंदर से पूरी तरह से टूटी हूँ,
जमाने की तो छोड़ो यार,
मै खुद से रुठी हुई हूँ,
पर आज तक परेशान होकर भी क्या हुआ,
फिर भी रोज एक समय आता है जब मैं कहती हूँ
बस बहुत हुआ।
ए भगवान,
इतना चुब्ने लगी हूँ आपको,
छुरी तो नही हूँ ,
जितनी परेशानी मे डाल दिया है,
शायद उतनी बुरी भी नही हूँ।
©snehakalra
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