I

बस यू ही

बस यू ही

कभी-कभी ज़िंदगी में समझ नहीं आता

क्या, क्यों, कैसे, किसलिए हो रहा है।

बस इतना एहसास होता है

कि जो भी हो रहा है,

बेहद ख़ूबसूरत हो रहा है।

दिल चाहता है

कि इसे रोका न जाए,

बस यूँ ही होने दिया जाए…

और इस कैफ़ियत के साथ

ख़ुद को भी बहने दिया जाए।

दिल सारे रस्म-ओ-रिवाज़

और सारी बंदिशें भूलकर

उस एहसास के साथ

बहता चला जाता है।

एक अजीब-सी ग़ैर-हक़ीक़ी कैफ़ियत में

इंसान ख़ुद को जीता चला जाता है।

जहाँ सोचने-समझने की फ़ुर्सत भी नहीं रहती,

बस बेवजह

ख़ुश रहने का सिलसिला चल पड़ता है।

और अगर उसमें

थोड़ी बेचैनी, थोड़ी बेकरारी भी शामिल हो

तो उस बेकरारी में भी

अजीब-सा सुकून महसूस होता है।

इन अनकहे जज़्बात के

कोई नाम नहीं होते,

फिर भी ये बहुत ख़ास होते हैं—

दिल के बेहद क़रीब।

एक ऐसी जगह

जहाँ न मंज़िल की परवाह होती है

न रास्तों का ख़ौफ़।

बस एक बेफ़िक्र दिल होता है

जो जीता चला जाता है…

और आँखें

कोई अनसुना सा नग़्मा

गुनगुनाती चली जाती हैं।

अकारण ही।

यूँ ही।

-शिवन्या