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बटवारा

बहुत दिनों से सोच रहा था,
लक्ष्मण मैं बन पाऊ।
लक्ष्मण बन कर मैं,
अपने भाईयो का सेवा कर पाऊँ।
फिर भी मैं असफल रहा,
बटवारे वाले दिनों में।
भाई भाई से अलग हुआ,
जमीन के तहदिलो में।
झूठी बातें, टूटी वादे,
दिल की दीवारों मे।
आंगन भी अब घिर चुका,
दो इंची के दीवारों में।
लेकिन मैं क्या करता,
यह हाथ का बंधन था।
पंच ने जो बात कही,
उसका ही अभिनंदन था।
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कुंदन कुमार
©kundankuma