लाख का शरीर बना बूढी आँखों की आस।
सींचा जिसे वृक्ष समझ बन रहा तिनका घास।।
घास होकर समझे नशे को च्यवनप्राश।
जिंदगी की जगह मौत को लिया तराश।।
तराशो जीवन जो नशा मुक्त हो।
मान मर्यादा आध्यात्म युक्त हो।
हो प्यार भरा संवेदन रक्त हो।
यूँ मिले आनंद कैसा भी वक्त हो।
🌹🌹🌹
©vikasgarg
V