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चाहत

गुंजती थी जो बरसों से कानों में मेरी,
दिल से उसे सुनना चाहता हुँ,
आगज हैं कोई, या हैं कोई फरेब,
और एकबार आजमाना चाहता हुँ।
- निलेश इंगोले
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