जिंदगी भर
सराफत की ...
दुकान चलाता रहा।
खरीददार
कांटों के थे।
मै फूल सजाता रहा।
दूरियां चाहते थे
जो सफर में..
नजदीकियां उन्हीं से
बनाता रहा।
हर आसान खेल...
जो जीतने थे मुझे
उनको भी तस्सली से
मै हारता रहा।
यूं तो सूरज ही
जगाता है रोज मगर..
चांद भी हर रात मुझे
जगाता रहा।
©kundankc
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