कितनी ही बार,जब
आदमी से आदमी
जुड़ नहीं पाता।
तो
चाय जोड़ देती है,
हर दिन कहे-अनकहे
रिश्तों की मध्यस्थता
करते हुए।
एक कप चाय पर
सपनों और अपनों की
बुनियाद रखी जाती है।
रिश्तों की उलझी गांठो
को सुलझाते हुए
अकेलेपन में भी
सुकून के अहसास के साथ,
इस छोर से उस छोर तक
अमूमन चाय का एक ही रंग है।
अल्हड़ दिनों में कैंटीन की बात,
या इंसानी पतझड़ में शाम का साथ।
बस एक चाय ही तो है,
जिसका मकसद बस जोड़ना है,
तोड़ना नहीं।
बावजूद इसके,
इस दौर में,
जब
जोड़ने वाली चीजें
टूट रही हों, तो
डर का साया चाय पर भी
लाज़िमी है।
काश!
चाय का रंग कभी
बदरंग न हो
चाय किसी आर्टिकल का
फ़साना न बने
चाय बस चाय रहे,
हमेशा की तरह
जोड़ने वाली।
@neeraj
©neerajk
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