चाह मेरी भी है आसमान छूने की,
मगर ये ख्वाब मुकम्बल होना सका।
जगा रातों को में भी, लेकिन
जी भर कर सो न सका ।
चला मंजिल की तरफ में भी बहुत लेकिन
आसमानो को छू न सका।
काबिल बहुत हूँ अपनी नज़रों में ,
मगर दुनिया की नजरों में
मुकाबिल हो न सका।
©shivatomar
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