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Childhood

बचपन
जिंदगी चल रही थी आहिस्ता ,
ना कोई फिक्र ना कोई चिंता |
हुए बड़े जब उम्र के साथ ,
जिंदगी बन बैठी एक किस्सा ||
सो लेते थे कहीं मगर ,
सुबह होते मां की गोद में |
जो मिल जाए कच्चा-पक्का ,
भर लेते थे अपने तोंद में ||
पापा के कदमों के साथ
रोज किया करते थे सैर |
कौन है अपना , कौन पराया ,
नहीं रहती थी कोई ऐसी बैर ||
पापा की उंगली पकड़कर ,
होता था रोज बाजार जाना |
कभी गोद , कभी जमीं,
कभी उनके कंधे पर चढ़ जाना ||
रोज सुबह उठकर माँ ,
हम सबको तैयार कराती थी |
लग जाए ना किसी की बुरी नजर
काला टीका वो लगाती थी ||
मैं, बाबू ,भैया और दीदी ,
सब साथ में स्कूल जाते थे |
मन लगाकर पढ़ाई करना ,
पापा ऐसी बात समझाते थे ||
खेल भी होती थी ऐसी ,
नादानी से भरी पड़ी |
पापा को जो छू ले पहले
मिलती थी उसको एक रबड़ी ||
वो भी क्या उम्र थी,
पूरी होती थी हर ख़्वाहिश |
जिस दिन स्कूल न जाने का होता मन,
करते थे पेट दर्द की नुमाइश ||
पापा भी करते थे पूरी कोशिश ,
पर हो जाते थे वो विफल |
भैया ,दीदी भी करते थे
साथ में नाटक की पूरी नकल ||
मम्मी भी क्या खूब डॉक्टर ,
कहने लगती, लगी है इसको नजर |
ठीक हो जाए उसका लाल दुलारा ,
छोड़ती थी ना कोई कसर ||
हमराही हैं हम सब उम्र के ,
जो बढ़ रही है धीरे-धीरे |
वो बचपन वाली जिंदगी ,
छूट गयी धीरे-धीरे ||
हम भी बन गए थे लालची,
छोड़ आए वो लड़कपन |
जवानी ने दी ऐसी लालच ,
छीन ले गई वो हमसे बचपन ||
युवावस्था में आ पड़े हैं ,
अब आएगा उम्र पचपन को
कोई ना भूल पायेगा ,
अपने प्यारे बचपन को ||
-- एबरारHumanity