धुंधली धुंधली सी कहीं बात थी
भूलभुलैया में गुजरी वो ख्वाब बड़ी रात थी
नन्हे पावक मैं अपनी रिवायत लिए
रात भर वो सुलगी ख्यालो की उल्झानो में
दीदार किसकदर किया उनसे वो जाने
जो हर लम्हो में मुहब्बत की धार में बहना जाने
बिखेड़ा पड़ा मैं में हरकते
उधर अपने कई रांह बिच खड़ा रहा था
काना फूसी करते वो मंजर भी
अब मैं कहां अपनी सूरत- ए - मुहब्बत निकालू
लिए बड़ा मैं कोई सूरत खड़ा
मैं निशा अपनी मदहोशी में करवटे लिये रहा ||
- अरबिंद कुमार
- 07 अप्रैल 2022
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