चल रहें पत्थरों का मंजिल ही मेरा सर है
मैं जिंदा हूं ये तो मेरी हौसला-ए-अजर है।
कुछ तो आसान हो गया है राह-ए-मंजिल
आती जो याद तेरी अब हमसफ़र है।
कहां था मेरे ग़ज़लों के अल्फाज़ में इतना दर्द
सब तुमसे मिला दर्द-ए-मुहब्बत का असर है।
हो रहा हूं हर रोज़ किस तरह मैं बर्बाद
तुम्हें कहां तनिक भी इस बात की खबर है।
अब मुझ बादाकश को है मय-ए-पैमाना की लत
मेरे इस ज़ख्मों के बस यही दवा कारगर है।
मिले गर फुर्सत तो सुन लेना किसी दिन
अनुराग कि जिंदगी हों गया कितना मुक्तसर है।
©anuragrahi
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