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चले सुख दुख कुछ बांट ली जाए।

चले सुख दुख कुछ बांट ली जाए
फारीहा निगारिना मेरी शोख हसीना।
पहले आप शुरू करोगी या फिर मै करूं
मेरी मर्ज-ए-इश्क़ नाज़नीना।
अब मैं ये सोंचता हूं गम-ए-इश्क़ बता दूँ क्या
जो भी नुक्स है किस्मत का
नुक्स-ए-जां है जान-ए-जां
नुक्स-ए-जां दिखा दू क्या।
बुतों की तरह चुप क्यों हो कुछ तुम भी बताओं
मैने यह सुना है कि खोयी खोयी रहती हो।
ना कभी सजती हो न संवरती हो
तन्हा खामोश बैठी रहती हो
इस तरह चुपचाप बैठने से क्या होगा
ना ही तेरा ना मेरा कभी भला होगा।
यूं खामोश बैठने से गर मसला जुदा हो जाए
तो मेरी राय में साथ चलो बैठा जाए
हमको फिक्र रहती है हमको न भुला दो तुम
अपनी जिद्द के आगे सेहत न गवां दो तुम।
अब भी तुमको लगता है गर मौका परस्त हूँ
मुझको फिर जेहन से हटा देना
आंखें जब गर आंसूओं से भर जाए
आ कर अपने सिने से मुझे तुम लगा लेना।
©anuragrahi