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◆ चवन्नी... ◆

पहले मौत का खौफ़ न था,
ऐसे बेखौफ़ हम हैं जियें,
चल रहे थे हम मंज़िल कि राहों पर,
और फिसलने का न कोई खौफ़ था,
चवन्नी कमाना चाहते थे मंज़िल के लिए,
लाखों का कोई शौक न था,
लोगों ने जाल हि बिछाये ऐसे,
कि राहों में हम खो बैठे,
हम चाहकर भी सम्भल ना सके,
ऐसा कुछ तो भी खास हुआ,
हम ठहरे थे चवन्नी के लिए,
और लोगों ने राहें मेरी पलटी,
टूट चुकी थी कश्ती मेरी,
फिर भी किनारा न मिला,
हम राहों में भटक गए,
और लोगों को सुकून मिला,
इबादत करते हम जिस मंज़िल कि,
हमे उसका कतरा भी न मिला,
लोगों ने मुह फेर लिए हमसे,
और हमने चवन्नी के लिए,
अपनी मंज़िलेही बदल डाली,
अब मौत बन गई हैं मजाक मेरी,
और जिन्दगी से भी हैं डर लगता...
©nilesh2016